अब वो सुदामा कहाँ जो तिया के कहे हरी धाम सिधावै।
प्रेम को बेंचि के कौड़ी के मोल अमीर बनै निज धर्म नसावै।।
बृद्धा अवस्था के चारि दिना हित जीवनु को फलु धूलि मिलावै।
मानै प्रभू श्री माधव को तबहूँ अंसुवन सों पैर धोवावै।।
तोरि भरोसो दियो निज को तब काहे को तंदुल काँख छिपावै।
अन्तर्यामी जानत स्याम को तब काहे नहि दुःख उठावै।।
चारि दिना दुःख और सहत तौ स्यामजी धावत धाम ही जाते।
भूलि सबै सुख द्वारिका के श्रीदामा के सेवक बन हर्षाते।।
स्वर्ग औ मोक्ष तौ दूरि धरौ प्रभु हैं भक्तन के भक्त कहाते।
जो सब के दुःख दूरि करत वे सुदामा का दुःख भी देख न पाते।।
किन्तु सुदामा तिया के कहे ते सबै अधबीच में बात बिगारी।
भक्ति के मारग बीच फंसी तृष्णा की भयानक एक बिमारी।।
त्याग को मारग होत कठिन है ता ते दई हरि दीनता भारी।
दीनता से भी जो हारि गयो वहु भक्त कहाँ बनि पायो है प्यारी।।
राजु मिल्यो द्वै लोक को केवल तीनहुँ लोक ध्रुव ठुकरायो।
श्री प्रह्लाद तथा नचिकेता ने स्वर्ग को धूरि समान बतायो।।
भक्ति का भूत चढ़ा जिनके तिनको धन वैभव रास ना आयो।
सोने की लंका बनाइ रह्यो वहु साधू है राक्षस वेद बतायो।।
प्रेम को बेंचि के कौड़ी के मोल अमीर बनै निज धर्म नसावै।।
बृद्धा अवस्था के चारि दिना हित जीवनु को फलु धूलि मिलावै।
मानै प्रभू श्री माधव को तबहूँ अंसुवन सों पैर धोवावै।।
तोरि भरोसो दियो निज को तब काहे को तंदुल काँख छिपावै।
अन्तर्यामी जानत स्याम को तब काहे नहि दुःख उठावै।।
चारि दिना दुःख और सहत तौ स्यामजी धावत धाम ही जाते।
भूलि सबै सुख द्वारिका के श्रीदामा के सेवक बन हर्षाते।।
स्वर्ग औ मोक्ष तौ दूरि धरौ प्रभु हैं भक्तन के भक्त कहाते।
जो सब के दुःख दूरि करत वे सुदामा का दुःख भी देख न पाते।।
किन्तु सुदामा तिया के कहे ते सबै अधबीच में बात बिगारी।
भक्ति के मारग बीच फंसी तृष्णा की भयानक एक बिमारी।।
त्याग को मारग होत कठिन है ता ते दई हरि दीनता भारी।
दीनता से भी जो हारि गयो वहु भक्त कहाँ बनि पायो है प्यारी।।
राजु मिल्यो द्वै लोक को केवल तीनहुँ लोक ध्रुव ठुकरायो।
श्री प्रह्लाद तथा नचिकेता ने स्वर्ग को धूरि समान बतायो।।
भक्ति का भूत चढ़ा जिनके तिनको धन वैभव रास ना आयो।
सोने की लंका बनाइ रह्यो वहु साधू है राक्षस वेद बतायो।।